Gomata Kathayein

गौओं की जननी, सम्पूर्ण गौओं की बीजस्वरूपा आदि गौ सुरभी का प्राकट्य

रामायण के अनुसार, सुरभि ऋषि कश्यप और दक्ष की पुत्री क्रोधावशा की पुत्री हैं। उनकी बेटियां रोहिणी और गंधारवी क्रमशः मवेशियों और घोड़ों की माँ हैं। फिर भी, यह सुरभि है, जिसे पाठ में सभी गायों की माँ के रूप में वर्णित किया गया है। हालांकि, पुराणों में, जैसे कि विष्णु-पुराण और भागवत-पुराण में, सुरभि को दक्ष की बेटी और कश्यप की पत्नी के रूप में वर्णित किया गया है, साथ ही गायों की माँ भी हैं।

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मत्स्य पुराण में सुरभि के दो परस्पर विरोधी विवरण हैं। एक अध्याय में, यह सुरभि को ब्रह्मा की पत्नी के रूप में वर्णित करता है और उनके संघ ने गाय का योगविश्वरी उत्पादन किया, उसे फिर गायों और चौपाइयों की माता के रूप में वर्णित किया जाता है। एक अन्य उदाहरण में, उन्हें दक्ष की एक बेटी, कश्यप की पत्नी और गायों की माँ के रूप में वर्णित किया गया है। महाभारत के परिशिष्ट हरिवंश ने सुरभि को अमृता (अमृत), गाय और रुद्र की माँ कहा। देवी भागवत पुराण में बताया गया है कि जब वे दूध के लिए भूखे थे, तो कृष्ण और उनके प्रेमी राधा दलन का आनंद ले रहे थे। तो, कृष्ण ने सुरभि नाम की एक गाय बनाई और अपने शरीर के बाईं ओर से मनोरथ नामक एक बछड़ा बनाया और गाय को दूध पिलाया। दूध पीते समय, दूध का बर्तन जमीन पर गिर गया और दूध फैल गया, जो दूध का क्षीरसागर बन गया। कई गायें तब सुरभि की त्वचा से निकलीं और उनके द्वारा कृष्ण के चरवाहे-साथियों (गोपियों) को भेंट की गईं। तब कृष्ण ने सुरभि की पूजा की और यह निर्णय लिया कि वह एक गाय है, दूध और समृद्धि का दाता है - बाली प्रतिपदा के दिन दिवाली पर पूजा की जाएगी।

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महाभारत

कपिला गौ के सींगो के ऊपर के भाग में विष्णु और इन्द्र तथा सींगो की जड में चन्द्रमा और व्रजधारी इन्द्र देवता रहते हैं। सींगो के बीच में ब्रह्माजी और ललाट में वृषभ ध्वज भगवान शंकर विराजते हैं। दोनों कानों में अश्विनी कुमार, नेत्रों में चन्द्रमा और सूर्य, दाँतों में मरुत देवता, जीभ में सरस्वती, रोमकूपों में मुनिगण, चमडे में प्रजापति, श्वासों में षडङ्ग तथा पद-क्रम सहित चारों वेद, नासापुटों में गन्ध और सुगन्धित पुष्प, नीचे के ओठ में सारे वसुगण, मुख में अग्नि, काख में साध्य देवता,

गले में भगवती पार्वती, पीठ में नक्षत्रगण, ककुद् (थूहे) में आकाश, अपान में सम्पूर्ण तीर्थ, गौ मूत्र में स्वयं श्री गङ्गाजी और गोबर में इष्ट-तुष्टमयी लक्ष्मीजी सदा निवास करती हैं। नासिका में ज्येष्ठादेवी, नितम्बों में पितृ, पूँछ में रमादेवी, दोनों ओर की पसलियों में विश्वेदेवता, छाती में शक्तिधारी कार्तिकेय, घुटनों, पिंडलियों और जाँघों में पाँचों वायु, खुरों के मध्य में गन्धर्वगण और खुरों के अग्रभाग में सर्प बसते हैं। चारों समुद्र उसके चारों स्तन हैं।

रति, मेधा,क्षमा, स्वाहा, श्रद्वा, शांति, धृति, स्मृति, कीर्ति, दीप्ति, क्रिया, कांति, तुष्टि, पुष्टि, संतति, दिशा और प्रदिशा (दिशाओं के कोने) सभी सदा कपिला की सेवा करती हैं। देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सराएं , समस्त लोक, द्वीप, समुद्र, गङ्गा आदि नदियां तथा अङ्गों और यज्ञों सहित समस्त वेद हर्षित होकर नाना प्रकार के मंत्रों से गौ की स्तुति किया करते हैं।

पद्मपुराण

वैदिक साहित्य के अनुसार जिन देवताओं का पूजन हम मंदिरों व तीर्थों में जाकर करते हैं। वे सारे देवता सामूहिक रूप से गौ माता में विराजमान है। इसलिए पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ किसी भी कार्य की सिद्धि के लि नित्य गौ माता की सेवा करनी चाहिए। महाभारत में कहा गया है-

यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु दीक्षया च लभेन्नरः। तत्पुण्यं लभते सद्यो गोभ्यो दत्वा तृणानि च।।

अर्थात्:- सारे यज्ञ करने में जो पुण्य है। सारे तीर्थ नहाने का जो फल मिलता है। वह फल गौ माता को चारा डालने से ही प्राप्त हो जाता है।

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जो प्रतिदिन गाय का स्पर्श करते हैं, वह इन समुद्रों में स्नान कर लेता है।

अतो मर्त्य: प्रपुष्ट्यै तु सर्वपारै: प्रमुच्यते।
गवां रज: खुरोद्वूतं शिरसा यस्तु धारयेत्॥
सर्वतीर्थजले स्नात: सर्वपापै: प्रमुच्यते।

अतएव मनुष्य को सर्वोत्तम पुष्टि के लिये गाय का स्पर्श करना चाहिये। इससे वह सारे पापों से छूट जाता हैं। गाय के खुर से उडी हुई धूलि को मस्तक पर धारण करने वाला मनुष्य भी सारे तीर्थों के जल में स्नान करने वाला समझा जाता है और वह भी समस्त पापों से छूट जाता है।

गौ सावित्री स्त्रोत

अखिल विश्व के पालक देवाधिदेव नारायण ! आपके चरणों में मेरा प्रणाम है। पूर्वकाल में भगवान व्यासदेव ने जिस गौ-सावित्री-स्त्रोत को कहा था, उसी को मैं सुनाता हूँ॥
यह गौओं का स्त्रोत समस्त पापों का नाश करने वाला, सम्पूर्ण अभिलाषित पदार्थों को देने वाला, दिव्य एवं समस्त कल्याणों को करने वाला है॥ गौ के सींगो के अग्रभाग में साक्षात जनार्दन विष्णुस्वरूप भगवान वेदव्यास रमण करते हैं। उसके सींगो की जङ में देवी पार्वती और सींगो के मध्यभाग में भगवान सदाशिव विराजमान रहते हैं॥

devi devta

उसके मस्तक में ब्रह्मा, कन्धे में बृहस्पति, ललाट में वृषभारूढ भगवान शंकर, कानों में अश्विनी कुमार तथा नेत्रों में सूर्य और चन्द्रमा रहते हैं॥ दाँतों में समस्त ऋषिगण, जीभ में देवी सरस्वती तथा वक्ष: स्थल में एवं पिंडलियों में सारे देवता निवास करते हैं॥ उसके खुरों के मध्य भाग में गन्धर्व, अग्र भाग में चन्द्रमा एवं भगवान अनंत तथा पिछले भाग में मुख्य-मुख्य अप्सराओं का स्थान है॥ उसके पीछे के भाग में पितृगणों का तथा भृकुटिमल में तीनों गुणों का निवास बताया गया है। उसके रोमकूपों में ऋषिगण तथा चमडी में प्रजापति निवास करते हैं॥

उसके थूहे में नक्षत्रों-सहित द्युलोक, पीठ में सूर्यतनय यमराज, अपानवायु में सम्पूर्ण तीर्थ एवं गौ-मूत्र में साक्षात गङ्गाजी विराजती हैं॥ उसकी दृष्टि, पीठ एवं गोबर में स्वयं लक्ष्मीजी निवास करती हैं, नथुनों में अश्विनी कुमारों का एवं होठों में भगवती चण्डिका का वास है॥ गौओ के जो स्तन हैं, वे जल से पूर्ण चारों समुद्र हैं, उनके रँभाने में देवी सावित्री तथा हुंकार में प्रजापति का वास है॥ इतना ही नहीं, समस्त गौएँ साक्षात विष्णुरूप हैं, उनके सम्पूर्ण अङ्गों में भगवान केशव विराजमान रहते हैं॥